न्यूज़ समय तक ब्यूरो शिवकरन शर्मा कानपुर दल-बदल लोकतंत्र नहीं, जनता के विश्वास की हत्या है : कुलकान्त शुक्ला सार्थक जनहित पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलकान्त शुक्ला जा ने हाल के दिनों में विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी छोड़कर सत्ता पक्ष या अन्य दलों में शामिल होने की बढ़ती प्रवृत्ति पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र और मतदाताओं के विश्वास पर सीधा आघात बताया है।उन्होंने कहा कि चुनाव के समय नेता जनता के सामने एक विचारधारा, एक राजनीतिक दल और अनेक वादों के आधार पर वोट मांगते हैं। जनता भी उसी विश्वास के आधार पर उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनती है। किंतु चुनाव जीतने के बाद यदि वही जनप्रतिनिधि व्यक्तिगत लाभ, सत्ता का सुख, पद की लालसा, जांच एजेंसियों के भय अथवा अपने कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को छिपाने के उद्देश्य से दल बदल लेते हैं, तो यह केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं बल्कि करोड़ों मतदाताओं के विश्वास की निर्मम हत्या है।कुलकान्त शुक्ला जी ने कहा कि आज देश की राजनीति में सिद्धांत, विचारधारा और जनसेवा की भावना कमजोर होती जा रही है जबकि सत्ता प्राप्ति किसी भी कीमत पर करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि अनेक नेता चुनाव से पहले जनता के बीच एक चेहरा दिखाते हैं और चुनाव जीतने के बाद अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरे राजनीतिक दलों की शरण में चले जाते हैं। ऐसे नेताओं का लोकतंत्र में कोई नैतिक अधिकार नहीं बचता।उन्होंने कहा कि यदि कोई जनप्रतिनिधि वास्तव में अपनी पार्टी की नीतियों से असहमत है तो उसे पहले अपने पद से इस्तीफा देकर पुनः जनता के बीच जाना चाहिए और नए दल के प्रतीक पर जनादेश प्राप्त करना चाहिए। जनता से एक दल के नाम पर वोट लेकर दूसरे दल की सेवा करना राजनीतिक छल और जनादेश का अपमान है।सार्थक जनहित पार्टी की प्रमुख मांगेंजो सांसद, विधायक अथवा जनप्रतिनिधि दल बदल करता है, उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त की जाए।ऐसे जनप्रतिनिधियों को कम से कम 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाए।दल-बदल करने वाले नेताओं को मंत्री पद, निगम, आयोग अथवा किसी भी राजनीतिक नियुक्ति से निर्धारित अवधि तक वंचित रखा जाए।जनता के जनादेश की रक्षा के लिए दल-बदल विरोधी कानून को और अधिक कठोर बनाया जाए।राजनीतिक नैतिकता को मजबूत करने के लिए जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है, न कि सत्ता की कुर्सी। जो नेता जनता के वोटों को अपनी निजी संपत्ति समझकर कभी भी किसी भी दल में चले जाते हैं, वे लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं। देश को ऐसे नेताओं से सावधान रहने की आवश्यकता है जो चुनाव के समय जनता की बात करते हैं और चुनाव जीतने के बाद केवल अपने हितों की रक्षा में जुट जाते हैं।उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि वे ऐसे अवसरवादी नेताओं को पहचानें और राजनीति में सिद्धांत, पारदर्शिता तथा जनसेवा को प्राथमिकता देने वाली शक्तियों को मजबूत करें।अंत में कुलकान्त शुक्ला जी ने कहा कि “सत्ता बदलना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन जनादेश बेच देना लोकतंत्र के साथ विश्वासघात है। जनता का वोट कोई व्यापारिक वस्तु नहीं है। जो नेता अपने स्वार्थ के लिए जनादेश का सौदा करते हैं, उन्हें राजनीति में सम्मान नहीं बल्कि कठोर दंड मिलना चाहिए।



